एक पल...
याद नहीं कब गलियारे से मैं गुज़रा था, यादों की सुई में पिरोया कोई किस्सा था। याद नहीं कब स्वाद एक कौर में मिलता था, खो गया अब सांझ अंधेरे वो मेरा ही हिस्सा था। याद नहीं कब शीशे से मैं कैसे मिलता था, होश नहीं पर खबर है पूरी,तब चेहरा भी खिलता था। याद नहीं कब पानी की बौछार से जीवन खिलता था, पैसों से भी मिल न पाए ऐसा एक पल भी अपना था।